Sunday, May 15, 2016

گرہن ग्रहण

बीतती रातें
अंगड़ाईयाँ
होने दो बातें
बे-इन्तहा
होने दो बातें
में तनहा

इतनी करीब तो हम आये
फिर भी क्यों में दूर
पास की मिठास
में भी कडुवाहट की आहट
क्यों खड़े हैं में
तुमसे इतनी दूर

मेरी झूठी बातें
कसमें वायदे
तेरे मोह के धागों से क्यों
पिरोये लहासिल सपने

तू होगा ज़रा पागल
तूने मुझको  ही चुना
कितनी इन्तेबा
मेरी इत्तिला


तुझे इख्तियार
हर पल हर लम्हा
आज़ाद आजमां
उड़ने की तेरी ख्वाइश

मेरी अना
गिरहती
यह  नायाब सी जस्बा
मेरा अंतर्मन बेजब्रा

मेरी ये झूटी माहजरत
लफ़्ज़ों की धोखेबाज़ी
फिर भी मुमकिन हो तो
मुझे मुआफ करे

यूँ ही कोशिश
सूनी  कशिश


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