जिस्म की महक
चेहरों की झलक
खोया खोया चाँद
वाह्याद नज़राने
बेख़ुदे तक़ाज़े
मेरी आँखों से उड़ते परदे
नफ़स
शर्र कहाँ खैर कहाँ ?
चिराग़-ए -कायनात के इशारे कहाँ?
राह तो फड़के
मुझे इलम हैं ज़रूर
वक़्त की नये आज़ादीयां
आज फ़िज़ूल बने
हाल जन्नत क्या बने?
आँख खोले
इक पल
हसीं आलम
बेशुमार
बेहक जाती बहती खुदगर्ज़
हरगिज़ न लाज़मी
नयी रीत रिवाज़'
में तो बदनसीब
काफिरों की नमाज़
सजदे बे-एहसास
मेरी फ़ित्रत व
मेरी कोशिशें कशिश
काश

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