इधर
मेरे दरवाज़े में
दस्तक देकर
थके हारे सोते मुझे
क्यूँ जगाते हो तुम ?
उधर
वे सर हिलाती
मस्कुराती
अपने लाडले को सराहती
सुनती अपने औलाद की दास्ताँ
सात समुन्दर पार
सुनहरे परदेस से
खिलौनों की ढेर समेत
आते उसके विलायती वालिद के किस्से
मामता में गीली रोटी चबाती
उनकी गोद में सोती
अरे! मुझे क्या इल्म ?
जैसे
उस माँ की ममता की हलावात में
मिटती हैं उनकी बेवगी की तल्खियाँ
वैसे
मुस्तक़बिल की हर दस्तक में
धुंधलते मासी के लम्बे फासले
न एहसास हाल की मसाइल
जागता हर दिन नहायत खुश हाल
सिर्फ दिखते सुबह के सितारे
तेरे मुहब्बत के इशारे
तो
उम्मीद भरी लोरियाँ सुनाते
सुलाये मुझे,
सूरज की पहली किरणों से
जगाये मुझे
फज्र के ठंडे आब-ए- रवान में
नहलाये मुझे
ऊद और इतर की मश्क से
मेहकाये मुझे
आखिर कहाँ दुनिया की तमाम मामता ?
तेरी रहमत के मुकाबले
आखिर, खुदाया !
तेरे अताओं में
तो क़ाबिल-ए-क़दर
यह नूर-ए-उम्मीद ही
मेरे दरवाज़े में
दस्तक देकर
थके हारे सोते मुझे
क्यूँ जगाते हो तुम ?
वे सर हिलाती
मस्कुराती
अपने लाडले को सराहती
सुनती अपने औलाद की दास्ताँ
सात समुन्दर पार
सुनहरे परदेस से
खिलौनों की ढेर समेत
आते उसके विलायती वालिद के किस्से
मामता में गीली रोटी चबाती
उनकी गोद में सोती
अपने अब्बे के ख़यालों में
उनकी जिगर की टुकड़ा
उनकी जिगर की टुकड़ा
जैसे
उस माँ की ममता की हलावात में
मिटती हैं उनकी बेवगी की तल्खियाँ
वैसे
मुस्तक़बिल की हर दस्तक में
धुंधलते मासी के लम्बे फासले
न एहसास हाल की मसाइल
जागता हर दिन नहायत खुश हाल
सिर्फ दिखते सुबह के सितारे
तेरे मुहब्बत के इशारे
तो
उम्मीद भरी लोरियाँ सुनाते
सुलाये मुझे,
सूरज की पहली किरणों से
जगाये मुझे
फज्र के ठंडे आब-ए- रवान में
नहलाये मुझे
ऊद और इतर की मश्क से
मेहकाये मुझे
आखिर कहाँ दुनिया की तमाम मामता ?
तेरी रहमत के मुकाबले
आखिर, खुदाया !
तेरे अताओं में
तो क़ाबिल-ए-क़दर
यह नूर-ए-उम्मीद ही
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