Sunday, August 24, 2014

Qutbi Tara







न गिला
न शिकवा
तुझसे
मेरा यारा


बेमंज़िल  सफर में
हमदम हमसफ़र
प्यासे मुसाफिर की
आब-ए-तस्कीन
वसी रेगिस्तान
में मेरी  नख्लिस्तान
या क़ुतबी तारा
मेरा यारा

देर तो सही
लेकिन दुरुस्त
कभी गुमराह
पर अभी  मुस्तक़ीम
न गिला
न शिकवा
मेरा यारा
उम्मीद आश्ना तारा
राह दिखा दे मुझे मुस्तक़िल 

Monday, August 18, 2014

Maamta-मामता

इधर
मेरे दरवाज़े में
दस्तक देकर
थके हारे सोते मुझे
क्यूँ जगाते हो  तुम ?

उधर
वे सर हिलाती
मस्कुराती
अपने लाडले को सराहती
सुनती अपने औलाद की  दास्ताँ
सात समुन्दर पार
सुनहरे परदेस से
खिलौनों की ढेर समेत
आते उसके  विलायती वालिद के किस्से
मामता में गीली  रोटी  चबाती
उनकी गोद में  सोती
अपने अब्बे के ख़यालों में
उनकी  जिगर की टुकड़ा 

अरे! मुझे क्या इल्म ?
जैसे
उस माँ की ममता की हलावात में
मिटती हैं  उनकी बेवगी की तल्खियाँ
वैसे
मुस्तक़बिल की हर दस्तक में
धुंधलते  मासी के लम्बे फासले
न एहसास  हाल की मसाइल
जागता हर दिन नहायत खुश हाल
सिर्फ  दिखते सुबह के  सितारे
तेरे मुहब्बत के इशारे

तो
उम्मीद भरी लोरियाँ सुनाते
सुलाये  मुझे,
सूरज की पहली किरणों से
जगाये मुझे
फज्र के  ठंडे आब-ए- रवान में
नहलाये मुझे
ऊद और इतर की मश्क से
मेहकाये मुझे
आखिर कहाँ  दुनिया की तमाम मामता ?
तेरी रहमत  के मुकाबले

आखिर, खुदाया  !
तेरे अताओं में
तो क़ाबिल-ए-क़दर
यह  नूर-ए-उम्मीद  ही 

Friday, August 15, 2014

अनकही -Ankahi- untold

                                                        अनकही

                        

सरफ़रोशी की तमन्ना अब (भी)  हमारे दिल में हैं *
मर मिटेंगे मुल्क पे क़ुर्बान
जितनी  आपके दिल में
उतनी  मेरे दिल में

मेरा मुल्क
मेरा देश
मेरा क़ौम
मेरा वतन

आज़माओ!
मेरे मुहब्बत-ए - हिन्द को
परखो!
मेरे वफ़ा-ए- हिन्द को
ज़ीना फाड़कर  देखो
कैसा  धड़कता  यह दिल
हमारा  हिन्दोस्तां
हमारा  गुलिस्तां
जिसमे फले फूले हम
हमारी सरज़मीन

फिर कब आ गए, भाई
ये  'तुम' और 'हम'
फिर भी क्यों ,  भाई
शक़ मुझपे
फिर भी क्यों ,  भाई
 नफ्रत मुझसे
फिर भी क्यों ,  भाई
थूकते हैं मुझपे
फिर भी क्यों ,  भाई
नहीं  देते, इज़्ज़त मुझे

नमाज़ी हूँ रोज़ा-पाबंद हूँ
तहज्जुद  गुज़ार हूँ
तो क्या, मेरे हुब - ए - वतन मेरा ईमान   नहीं ?
तो  क्या, मेरा  फ़र्ज़ - ए - मुल्क  मेरी इबादत  नहीं ?


मेरी शान
मेरी आन
मेरी जान
मेरा मान

हर लहज़ा
हर लम्हा
हर कदम
हम साथ-साथ

मत फैलाओ बैर
मत सोचो ,मैं  गैर

हर लहज़ा
हर लम्हा
हर कदम
हम साथ-साथ

सरफ़रोशी की तमन्ना अब (भी) हमारे दिल में हैं *
मर मिटेंगे मुल्क पे क़ुर्बान *
वक़्त आने पर बता देंगे तुझे, ए आसमान,*
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है*

The untold (A bad translation of above)

The desire for revolution is (still) in our hearts
To sacrifice for my nation
How much in  heart of you all
That much in my heart

My nation
My country
My people
My land

Put to test my love for my Hind
Put to test my loyalty for my Hind
Break my chest and see
How my heart beats
For our Hindustan
For our garden
In which you and me
Flowered and ripened
Our land

Then when did this (situation) come
This ‘you’ and ‘me’
Even then why, dear brother
You doubt on me
Even then why, dear brother
You hate me for no reason
Even then why, dear brother
You spit on me
Even then why, dear brother
You do not respect my honour 

I pray  Namaz , I fast
I am pious
But my love for my motherland is (part of) my belief
But my duty to my nation is my prayer

My pride
My glory

Every moment
Every second
Every step
We be together

Do not spread this enmity
Do not think, I am different

The desire for revolution is still in our hearts
To sacrifice for my nation
When the time comes, we shall show thee, O heaven*
For why should we tell thee now, what lurks in our hearts?*





*-  these lines taken from Ramprasad Bismil’s Sarfarosh ki Tamannah 

Sunday, August 10, 2014

Ye Tamannayen Lahaasil Si!

खुशियों का साराब देखते देखते 
ख्वाबों के समुन्दर में तैरते तैरते
ख्वाइशों की बुलंदियों में घुमशुदा
खयालें सरज़मीन की सरहदें पार किये
लेकिन ये तमन्नायें लहासिल सी 

मेरे अरमानों के गुलिस्तान पर
क्यूँ यह ज़िल्लत?
जीने लगा हूँ
जीने दो
मुमकिन तो नहीं
लेकिन उम्मीद की झलक तो सही 
या इलाही! यह कैसी सज़ा हैं?